बुधवार, 24 नवंबर 2010

वो चाँद मेरा रोता होगा कहीं



वो चाँद मेरा  रोता  होगा कहीं
दुपट्टे में   मुंह   छिपाए  तो नहीं   

काटे न कटी  होगी रात उसकी 
आहटों  पर वो  चौकी होगी कहीं

इन   पहाड़ों से   पूछा    होगा उसने
इस बाबले बादल का पता तो नहीं

उसने लिखी होगी भीगी-सी चिट्ठी
बना के अश्कों   की स्याही तो नहीं

वो     आयेंगें यहाँ मैं रहूँगा नहीं
इश्क से इश्क अब मिलेंगे नहीं





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