गुरुवार, 23 सितंबर 2010

आप तालियाँ नहीं बजायेंगे


मेरी इस कविता के बाद
आप तालियाँ नहीं बजायेंगे
क्योंकि
हमारी आदत है
तालियाँ बजाने की
हीरो के भोंडे एक्शन पर
हीरोइन की कातिल अदाओं पर
तेंदुलकर के लखपती छक्कों पर
या तब
जब सडक पर
किसी लड़की की स्कूटी 
बार-बार किक मारने पर भी
स्टार्ट नहीं होती 


मेरी इस कविता के बाद

आप तालियाँ नहीं बजायेंगे
क्योंकि मेरी कविता में
वह भूख तालियाँ बजाती है
जो भूख
कपड़े उतरवाती है
कपड़े पहनवाती है
भूखे को
फाइव स्टार होटल ले जाती है
और उसे भोजन की तरह परोसती है
अंग अंग परोसती है
और अहले सुभाह
उसे डस्टबीन में छोड़ जाती है
इस लिए मेरे दोस्त
मेरी इस कविता के बाद

आप तालियाँ नहीं बजायेंगे



फिर भी आप और हम तालियाँ बजाते हैं
नेताओं के भोंडे भाषणों पर
कभी उनके छिछले मजाकों पर
कभी पैसे ले कर
तो कभी
नेता के इशारों पर
हमारी सारी तालियों की आवाज
खो जाती  है हवा में  
और चुनाव के बाद तो
नेताजी भी हवा हो जाते हैं
और हम हाथ मलते रह जाते हैं
और नेता सत्ता की शराब की बोतलें
कभी यहाँ
कभी वहां
खोलता रहता है
और हम पीने के पानी के लिए
लाइन लगाते हैं


मेरी इस कविता के बाद

आप तालियाँ नहीं बजायेंगे
यह कवीता
तालियों के ब्यापार से अपने को
दूर रखना चाहती है
क्या आप भी
इन तालियों से दूर नहीं रहना चाहते हैं?








1 टिप्पणी:

  1. बहुत सटीक व्यंग और भद्देपन पर तालियां बजाने वाले समाज पर तमाचा
    ऐसा ही होता है....हम सब मिलकर यही तो करते हैं
    http://veenakesur.blogspot.com/

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